Sep 18, 2013

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पांचवीं अनुसूची की नई व्याख्या को लेकर जो चर्चा जे.एन.यू. मे इस साल जनवरी में शुरु हुई थी वह जल्दी ही छिछले व्यक्तिगत आरोपों के कीचड़ में उतर गई। कुछ लोगों ने मेरे तर्कों के बजाए मेरे कपड़ों पर निशाना लगाया था और मैंने जवाब देना बंद कर दिया। 25 अक्टूबर को जब मैं जे.एन.यू के एक सेमीनार में बोलने आउंगा तब इस मामले पर आखिरी सफ़ाई भी दी जाएगी। उम्मीद है कि इस दरम्यान जो तरक्की हुई है उसके मद्दे नज़र हमारे स्कॉलर्स बेहतर सोच और तैयारी के साथ आएंगे। सिर्फ़ इतना ही नही हुआ कि जे.एन.यू. के तीन विभागाध्यक्षों समेत कई बड़े विचारकों ने इस "नई व्याख्या" को मान लिया है, या कि इस मामले पर भारत सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों को सफ़ाई देनी पड़ी है, बल्कि देश के दो बड़े विधि विश्वविद्यालयों में अब इसी व्याख्या पर आधारित कोर्स तय कर दिए गए हैं। पांचवीं अनुसूची की यह व्याख्या अब छठवीं अनुसूची तक फैल गई है और कई प्रोफेसर भी खुल कर बोल पा रहे हैं। इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि सेमीनार का आयोजन ’उत्तर-पूर्व भारत अध्ययन केंद्र’ ने किया है। नागरिकता-स्वायत्तता, सामाजिक न्याय, संविधान, आधुनिक इतिहास, आदिवासी अधिकार और पर्यावरण से जु्ड़े स्कॉलर्स के लिए यह मुबाहिसा मुफ़ीद होगा। 3 am, Fri., 25 Oct., SSS-I, "Rhetoric in Tribal Question: diagnosis and remedies".

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@jai adivasi yuva shakti@
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